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मैकाले द्वारा लिखी गई "भारतीय दण्ड संहिता" (Indian Panel Code) लागू हुई| IPC लागू होने पर कानूनी रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी बराबर हो गए और मनुस्मृति का वर्णभेद

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मैकाले द्वारा लिखी गई "भारतीय दण्ड संहिता" (Indian Panel Code) लागू हुई| IPC लागू होने पर कानूनी रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी बराबर हो गए और मनुस्मृति का वर्णभेद लार्ड मैकाले का जन्म 25 अक्टूबर सन् 1800 ईस्वी को इंग्लैण्ड के लेस्टरशायर नामक स्थान पर हुआ था। लार्ड मैकाले अंग्रेजी के प्रकाण्ड विद्वान, समर्थक एवं सफल नितिनिर्धारक थे।           ब्रिटिश सरकार ने चार्टर ऐक्ट 1833 के अनुसार भारत के लिये प्रथम विधि आयोग गठन किया, जिसके अध्यक्ष बने लॅार्ड मैकाले और 10 जून 1834 को भारत में पहुंचे।  #मनुस्मृति_विधान_का_दफन                     06अक्टूबर1860 को लॅार्ड मैकाले द्वारा लिखी गई "भारतीय दण्ड संहिता" (Indian Panel Code) लागू हुई| IPC लागू होने पर कानूनी रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी बराबर हो गए और मनुस्मृति का वर्णभेद,अमानवीय काला कानून खत्म हुआ या यों कहिए कि 06अक्टूबर1860 को ही मनुस्मृति विधान का दफन हो गया। #प्राचीन_गुरुकुल_शिक्षा_पद्धति एवं #लार्ड_मैकाले_की_आधुनिक_शिक्ष...

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# _गोत्र की गाथा  〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हमारी महान् वैदिक परम्परा रही है कि हम सब अपने-अपने गोत्रों को याद रखते हैं । इसके लिए हमारे मनीषियों, ऋषियों ने कितनी अच्छी परम्परा शुरु की थी कि विभिन्न संस्कारों का प्रारम्भ संकल्प-पाठ से कराते थे, जिसके अन्तर्गत अपने पिता, प्रपिता, पितामह, प्रपितामह के साथ-साथ गोत्र, प्रवर, आदि का परिचय भी दिया जाता था । इसमें जन्मभूमि, भारतवर्ष का भी उल्लेख होता था। इसमें सृष्टि के एक-एक पल का गणन होता था और संवत् को भी याद रखा जाता था । यह परम्परा आज भी प्रचलित है, कुछ न्यूनताओं के साथ। गोत्र और प्रवर की आवश्यकता विवाह के समय भी होती है । इसलिए इसे जानना आवश्यक है । इसके अन्तर्गत हम इन पाँच विषयों पर चर्चा करेंगे : --- 1) गोत्र 2) प्रवर 3) वेद 4) शाखा 5) सूत्र 6) देवता ================================ (1) गोत्र : ---- गोत्र का अर्थ है, कि वह कौन से ऋषिकुल का है। या उसका जन्म किस ऋषिकुल में हुआ है। किसी व्यक्ति की वंश परंपरा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता है। हम सभी जानते हैं कि हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान हैं ।...

पीपल नीम तुलसी पौधों के प्रति सरकार का उदासीन रवैया जिम्मेदारी कौन ले

आप को लगेगा अजीब वार्ता है, किन्तु यह सत्य है पिछले 68 सालों में पीपल, बरगद और नीम के पेडों को सरकारी स्तर पर लगाना बन्द किया गया है। पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड का 100% एबजॉर्बर है, बरगद 80% और नीम 75 % । इसके बदले लोगों ने विदेशी यूकेलिप्टस को लगाना शुरू कर दिया, जो जमीन को जल विहीन कर देता है... आज हर जगह यूकेलिप्टस, गुलमोहर और अन्य सजावटी पेड़ो ने ले ली है । अब जब वायुमण्डल में रिफ्रेशर ही नहीं रहेगा तो गर्मी तो बढ़ेगी ही, और जब गर्मी बढ़ेगी तो जल भाप बनकर उड़ेगा ही । हर 500 मीटर की दूरी पर एक पीपल का पेड़ लगायें,  तो आने वाले कुछ साल भर बाद प्रदूषण मुक्त भारत होगा । 🌳 वैसे आपको एक और जानकारी दे दी जाए । पीपल के पत्ते का फलक अधिक और डंठल पतला होता है, जिसकी वजह शांत मौसम में भी पत्ते हिलते रहते हैं और स्वच्छ ऑक्सीजन देते रहते हैं । वैसे भी पीपल को वृक्षों का राजा कहते है । इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए । मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु, सखा शंकरमेवच। पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम, वृक्षराज नमस्तुते।। अब करने योग्य कार्य । इन जीवनदायी पेड़ों को ज्यादा से ज्यादा लगाने के लिए समाज में जागरूक...

वनस्पतियों का इतिहास

हिन्दुओं की पूजा में प्रयोग किए जाने वाले सारे पौधों, अन्नाजों, फलों और अन्य खाद्य सामग्रियों का नाम बताओ, ताकि उन्हीं के आधार पर हम यह पता लगा सके कि हिन्दू धर्म कहां से आया हैं। कुछ सामग्री इस प्रकार हैं: नारियल, केला, सुपारी, चावल, चंदन, सिंदूर, और कपूर। इनमें से एक भी पौधा उत्तर भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया और उत्तरी एशिया से नहीं हैं। विद्वान हमको मूर्ख बना रहे हैं कि हिन्दू धर्म यूरेशिया से आया हैं! लेकिन कोई भी हिन्दू पूजा सामग्री उत्तर भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया और उत्तरी एशिया में नहीं पाई जाती हैं। शंख का ही उदाहरण ले लो, जो हिन्दू पूजा की एक आवश्यक सामग्री हैं, जो कहां पाया जाता हैं? यह भी — नारियल, केला, सुपारी, चावल, चंदन, सिंदूर, और कपूर की तरह — उष्णकटिबंधीय तटीय क्षेत्रों में पाया जाता हैं।